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आत्माशरीर से कैसे बाहर निकलती हैं?

by Aejaz
आत्माशरीर से कैसे बाहर निकलती हैं?

मित्रो…….आपने भी कभी अपनी आखों के सामने किसी की मृत्यु होते जरूर देखी होगी और वहां मौजूद लोगो को ये भी कहते सुना होगा कि अब इसके प्राण निकल गए हैं। और इसकी मृत्यु हो चुकी है।……….

परन्तु क्या आपने कभी ये जानने की कोशिश की है कि आखिरकार ये प्राण अर्थात आत्मा शरीर से कैसे बाहर निकलती  है?……………….

यदि नहीं,………..तो कोई बात नहीं……….हमारी आज की इस वीडियो में आपको इस प्रश्न का उत्तर जरूर मिल जायेगा jisaka varnan garud puran me kiya gaya hai।

नमस्कार मित्रो स्वागत है,आपका एक बार फिर THE DIVINE TALES पर।

मित्रो,जैसे की आप सभी जानते ही हैं,……..मृत्यु,मनुष्य के जीवन का वो कड़वा सच है जिसे bada se bada ज्ञानिbhi swikar nahi karna chahata jabaki wah janata hai ki एक दिन sabhi ki mrityu hona तय हैं। aur jo manushy is sach ko swikar kar leta hai wah budhiman kahalata hai . तो चलिए,ab janate hain ki आत्मा शरीर से  कैसे बाहर निकलती है?aur इसके पीछे की प्रक्रिया kya हैं।

गरुण पुराण 9वे अध्याय में varnan kiya gaya hai ki मनुष्य के मुख,दोनो नेत्र,दोनो नासिका रंध्र तथा दोनो कान ये सात ऐसे छिद्र अर्थात द्वार बताए गए हैं, जिनमें से किसी एक द्वार से सुकृती अर्थात पुण्यात्मा के प्राण निकलते हैं।

अपान arthat गुदा से बाहर निकलने वाली वायु से मिले हुए प्राण जब पृथक हो जाते हैं। तब प्राण वायु सूक्ष्म होकर शरीर से बाहर निकलती है।

isake alave यदि आपने कभी ध्यान दिया हो तो,मरते हुए व्यक्ति के सबसे पहले पैर ठंडे पड़ते है,उसके बाद घुटने के नीचे का हिस्सा,………….ऐसे करते करते उस व्यक्ति का  पूरा शरीर ठंडा पड़ने लगता है,मानो जैसे ऊर्जा सिमट रही हो।और अंततःये सम्पूर्ण चेतना सिमटती हुई एक चक्र पर आ कर एकत्र हो जाती है। जिस चक्र पर आप सबसे ज्यादा जिए हैं।……

जैसे कि ध्यानियों की ऊर्जा मुख्य रूप से ज्ञानचक्र से निकलती है। और इसके विपरित जो लोग अपनी पूरी जिंदगी ध्यान से दूर रहे है,और जिन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन खान – पान और सांसारिक सुख के लोभ में ही बीता दिया हो ऐसे मनुष्य के प्राण मणिपुर चक्र से निकलते हैं।वहीं ऐसे मनुष्य जिन्होंने अपने पूरे जीवन में केवल संभोग के बारे में ही सोचा है,ऐसा मनुष्य अपने अंतिम समय में इसके बारे में न सोचे ये तो संभव ही नही है। परिणामस्वरूप ऐसे व्यक्ति की ऊर्जा मूलाधार चक्र से बाहर निकलती है।

इसी के साथ जिन मनुष्योंका सम्पूर्ण जीवन ज्ञान के इर्द गिर्द बीता हो ऐसे मनुष्य की ऊर्जा गला चक्र अर्थात विशुद्ध चक्र से निकलती है। ऐसे ही जो मनुष्य अंतिम समय में,अपने इष्ट या गुरु को याद करते हुए प्राण त्यागते है,उनकी ऊर्जा आंखो से निकलती है। और अंत में वो मनुष्य आते हैं,जिनकी ऊर्जा सहस्त्रारचक्र से निकलती है, ऐसे मनुष्यों को बहुत ही भाग्यशाली माना जाता हैं।क्योंकि शरीर त्यागने के,सबसे उचित मार्ग माने जाने वाले सहस्त्रारचक्र से निकलनेवाली आत्मा को सीधे मोक्ष की प्राप्ति होती है।

इसी के साथ प्राण निकलने के संदर्भ में और भी बहुत सी बातों का वर्णन गरुण पुराण में मिलता है,जिसके अनुसार –प्राण त्यागने के समय मनुष्य को अन्न शन त्याग अर्थात अन्न और जल का त्याग करना चाहिए और यदि वह विरक्त (आसक्ति रहित) द्विजन्मा हो तो उसे आतुर सन्यास लेना चाहिए।आतुर सन्यास से अभिप्राय है– एक ऐसा सन्यास जो सांसारिक जीवन से दुखी होने पर जल्दी से ग्रहण किया जाता है।

प्राण के गले तक आने पर जो मनुष्य “मैंने सन्यास ले लिया है।“…….ऐसा बोलता है,वह मृत्यु के बाद विष्णुलोक को प्राप्त होता है।और ऐसे मनुष्य का जन्म अब दोबारा इस धरती पर नहीं होता।

जो व्यक्ति मृत्यु से पूर्व, कथित सभी कार्य कर लेता है। मृत्यु के समय ऐसे व्यक्ति के प्राण ऊपर के छिद्रों से सुख पूर्वक निकलते है। साथ ही योगियों के संदर्भ में गरुण पुराण में बतलाया गया है। कि योगियों के प्राण तालुरंध्र से निकलते हैं।

गरुण पुराणमें- शरीर से, ईश्वर रूपी प्राण वायु के निकलने के बाद, उस शरीर की तुलना एक ऐसे वृक्षसे की है।………..जिसका आधार न होने के कारण वह गिर गया हो।

क्या आप जानते हैं?…….प्राण से मुक्त होने के बाद शरीर तुरंत ही चेष्टा शून्य,घृणित,दुर्गंधयुक्त,अस्पर्श्य और सभी के लिए निंदित हो जाता है।

मृत शरीर की तीन अवस्थाएं होती हैं –कीड़ा, विष्ठा और भस्मरूप।

इसे आप ऐसे समझ सकते हैं,मृत शरीर में कीड़े पड़ते हैं, वोमल के समान दुर्गंध युक्त हो जाता है,और अंततः चिता में जल कर भस्म हो जाता है। इसलिए क्षणभर में नष्ट होने वाले इस शरीर पर गर्व करना अनुचित है।

मृत्यु के पश्चात,पंचभूतोसे निर्मित इस शरीर का पृथ्वी तत्व – पृथ्वी,जलतत्व – जल,तेजस तत्व –तेज और वायु तत्व वायु में लीन हो जाता है।परन्तु सभी प्राणियों के शरीर में स्तिथ सर्वव्यापी,शिव स्वरूप और जगत साक्षी आत्मा ही एक मात्र ऐसी चीज है,जोकि अजर अमर है।जिसका कोई अंत नहीं है…..जो एक शरीर को त्याग कर, दूसरे शरीर में प्रवेश कर लेती है।

मृत व्यक्ति के शरीर से निकली ये आत्मा अपने पुराने शरीर से निकल कर अपने कर्म कोश में इकट्ठा हुए कर्मों द्वारा निर्मित नए शरीर में प्रवेश करती है।गरुण पुराण में इस तथ्य को कुछ इस प्रकार समझाया गया है।जैसे एक घर के जल जाने पर उसमे रहने वाला व्यक्ति जाकर दूसरे नए घर में रहने लगता है ,उसी प्रकार आत्मा भी पुराना शरीर छोड़कर नया शरीर ग्रहण कर लेती है।

तत्पश्चात उस आत्मा को लेने, छोटी-छोटी घंटियों की मालाओं से सुसज्जित विमान को लेकर देवदूत आकाश से उतरते हैं। धर्मको जानने वाले , धार्मिक और बुधिमान लोगो के प्रिय ये देवदूत उनके कृत्यों के अनुसार,आत्मा को स्वर्ग लेकर जाते हैं।जहां दिव्य देह धारण कर, निर्मल वस्त्रों,स्वर्ण और रत्नों से सुसज्जित इस जीव का स्वागत देवताओं द्वारा किया जाता है।

गरुण पुराण में इसके अतिरिक्त कुछ विशेष परिस्थितियों का वर्णन भी किया गया है। जिसके अनुसार वे व्यक्ति जिनकी मौत अचानक या फिर हिंसात्मक तरीके से होती है।ऐसे व्यक्तियों की आत्मा इन सबसे कुछ अलग तरीके से अपना शरीर छोड़ती है।

इसी के साथ ऐसे व्यक्ति जिनकी मृत्यु लंबी बीमारी के बाद होती है, तो इस दौरान उनके शरीर की ऊर्जा का क्षय तब तक बहुतकम हुआ होता है। इसी कारण ऐसी आत्मा शरीर छोड़ते समय काफी दुविधा में होती है। इसलिए ऐसी आत्मा का किसी भी अंग से निकलना निश्चित नहीं होता।

मित्रो यदि आप वर्णित विशेष परिस्थितियोंमें आत्मा कैसे शरीर छोड़ती है।इस बारे में विस्तार से जानना चाहते हैं,तो नीचे comment करके जरूर बताए।

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