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कैसे गणेश जी के जन्म से पहले भी होती थी उनकी पूजा

by Divine Tales

दोस्तों क्या आप जानते है गणेश जी का जन्म होने से पहले भी उनकी पूजा ही सबसे पहले की जाती थी… चौंक गये न आप.. पर ये बात बिल्कुल सच है… क्यों कि भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह के समय भी गणेश पूजन पुरे विधिविधान के साथ किया गया था…

अब सोचने वाली बात है कि जब गणेशजी का जन्म देवी पार्वती और शिव जी के विवाह के बाद हुआ था तो इनकी शादी में उनकी पूजा कैसे हुयी…

आपको बता दें पुराणों में गणपति जी के जन्म से जुड़ी कई कथाएं बतायी गयी है… और सभी कथाएं एक- दूसरे से थोड़ी अलग ही पायी जाती है… एक- दूसरे से अलग होने के बावजूद सारी कथाओं में ये समानत है कि गणेश जी का जन्म शिव जी और पार्वती जी के जरिए ही हुआ है।

वेदों और पुराणों को न समझ पाने की वजह से लोग इस बात पर शक करते है कि अगर गणपति जी देवी पार्वती के पुत्र है तो शिव जी की शादी में उनकी पूजा कैसे की जा सकती है…

बता दें इस सवाल का जवाब तुलसीदास जी ने पहले ही दे दिया था… तुलसीदास जी के एक दोहे के अनुसार भगवान गणपति जी किसी के बेटे नहीं हैं, वो अनंत, अनादि और अजर है… बाबा तुलसीदास की माने तो जो गणेश जी महादेव के पुत्र कहलाये जाते हैं… वो महागणपति के अवतार है… उस महागणपति के जिसका उल्लेख वेदों में किया गया है… लेकिन वेदों में
इनका नाम गणेश नहीं बल्कि गणपति या ब्रह्मणस्पति लिखा गया है… दरअसल हमारे सनातन धर्म में चार वेद हैं और अट्टारह पुराण है… यानि की पुराणों में जिन्हें गणपति कहा गया है… वो वेदों में लिखे ब्रह्मणस्पति या फिर कहे महागणपति के अवतार है।

कहा जाता है कि देवी दगदंबा ने महागणपति की तपस्या कर के उनसे ये प्रार्थना की थी कि वो उनके पुत्र के रुप में अवतार लें… माता की प्रार्थना स्वीकार कर के महागणपति ने उन्हें मां बनने का सौभाग्य दिया और पुत्र रुप में उनके घर में अवतरित हुये।

आसान भाषा में कहे तो जैसे विष्णु जी अजर- अमर है और राम, कृष्ण वामन आदि उनके अवतार है… ठीक वैसे ही गणेश जी महागणपति के अवतार है।

अब आपको गणेश जी के जन्म की तीन कथा बताते हैं… जो एक- दूसरे से बिल्कुल अलग है..

श्रीगणेश चालीसा के अनुसार माता पार्वती ने पुत्र प्राप्ति के लिए कठोर तप किया… तप से प्रसन्न होकर श्री गणेश ब्राह्मण का रूप लेकर आए और उन्होंने माता पार्वती को बिना गर्भ धारण किए ही दिव्य और बुद्धिमान पुत्र की प्राप्ति का वरदान दिया… वरदान देकर वो अंतर्ध्यान हो गए और पालने में बालक के रूप में आ गए।

पालने में बालक देखकर माता पार्वती खुशी से झूम उठीं… भोलेनाथ और पार्वती जी ने विशाल उत्सव रखा और सभी देवी देवताओं को बुलाया.. सभी देवताओं के साथ शनि देव भी आये… लेकिन अपनी दृष्टि की वजह से वो बच्चे को देखने से बच रहे थे.. किसी तरह सकुचा कर जब वो बालक को देखने पहुंचे, तो उनकी किंचित दृष्टि पड़ते ही बालक का उसका सिर आकाश में उड़ गया… उत्सव का माहौल मातम में बदल गया… तभी तुंरत गरूड़ देव को चारों दिशा में उत्तम सिर लाने को कहा गया… जिसके बाद वो हाथी का सिर लेकर आए… और शंकर जी ने उसे बालक के शरीर से जोड़कर उसमें प्राण डाले… तब से गणेश जी का सिर हाथी का हो गया

वहीं दूसरी कथा शिवपुराण में दी गई है… जिसके अनुसार एक बार देवी पार्वती ने अपने शरीर से हल्दी का उबटन उतारा और उससे एक पुतला बना दिया… इसके बाद उन्होंने पुतले में प्राण डाल दिए… इस तरह से गणेश जी का जन्म हुआ… इसके बाद जब वो नहाने जा रही थी.. जो उन्होंने गणेश को आदेश दिया कि तुम यही द्वार पर बैठो और जब तक मैं न कहूं किसी को अंदर नहीं आने देना।

कुछ समय बाद शिवजी वहां आये और घर के अंदर जाने लगे… लेकिन गणेशजी ने उन्हें वहीं रोक दिया… दोनों में कुछ ही देर में विवाद और फिर युद्ध होने लगा… इस दौरान शिवजी ने अपना त्रिशूल निकाला और गणेश का सिर काट डाला।

जैसे ही इस बात की खबर पार्वतीजी को हुई उन्होंने शिवजी से कहा कि ये आपने मेरे बेटे के साथ क्या किया…शिवजी ने पूछा कि ये तुम्हारा बेटा कैसे हो सकता.. तब पार्वती जी ने शिवजी को पूरी बात बताई।

तब शिव जी के कहने पर गरूड़ जी उत्तर दिशा से ऐसे बच्चे का सिर लाये जिसकी मां उसकी ओर पीठ कर के सो रही थी.. और वो सिर था एक हथिनी के बच्चे का.. भगवान शिव ने वह बालक के शरीर से जोड़ दिया। उसमें प्राणों का संचार कर दिया।

वहीं वराहपुराण के मुताबिक भगवान शिव ने गणेशजी को पचंतत्वों से बनाया… जब भगवान शिव गणेश जी को बना रहे थे तब उन्होंने विशिष्ट और अत्यंत रुपवान रूप पाया… जब देवताओं को गणेशजी के रूप और विशिष्टता के बारे में पता लगा तो उन्हें डर सताने लगा कि कहीं ये सबके आकर्षण का केंद्र ना बन जाए… इस डर को भगवान शिव भांप गए थे, जिसके बाद उन्होंने उनके पेट को बड़ा कर दिया और मुंह हाथी का लगा दिया।

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