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क्या कर्ण का वध अधर्म था?

by Aejaz
क्या कर्ण का वध अधर्म

मित्रों… महाभारत हिंदू धर्म का वो महाकाव्य है, जिसे आपने जीवन में एक ना एक बार तो जरूर पढ़ा या फिर देखा होगा…

यही नहीं महाभारत का एक पात्र ऐसा भी जरूर होगा जो आपको सबसे अधिक प्रिय होगा… और आप उस पात्र को इस महाकाव्या का सबसे शक्तिशाली योद्धा भी मानते होंगे….

नमस्कार मित्रों…. स्वागत है आप सभी एक बार फिर the divine tales पर… आज मैं इस वीडियो में महाभारत के एक ऐसी ही महान और शक्तिशाली पात्र के बारे में बात करने जा रहूं हूं… जिसका वध आज भी बहस का विष्य है….

मित्रों, मैं बात कर रहा हूं… सूर्यपुत्र कर्ण की… क्या कर्ण की मृत्यु अधर्म थी….? आइए इस सवाल का जवाब मिलकर जानते हैं इस वीडियो में….

मित्रों महाभारत का युद्ध एक से बड़े एक कई वीर योद्धओं के बीच लड़ा गया था… और ऐसे ही एक योद्धा थे सूर्यपुत्र कर्ण… जिनका उनके ही अनुज अर्जुन ने वध किया था…

ऐसा कहा जाता है कि अगर कर्ण जीवित रह जाते तो युद्ध की दिशा बदल सकती थी… और जीत कौरवों की हो सकती थी….

और यही वो वजह थी कि भगवान श्री कृष्ण ने विश्व के सबसे अच्छे धनुर्धरों में से एक कर्ण के वध के लिए अर्जुन को चुना था…

लेकिन कई हजार साल बीत जाने के बाद भी आज ये बहस का सवाल है कि क्या कर्ण का वध अधर्म था….? तो मित्रों इस सवाल का जवाब जानने के लिए हमें महाभारत की उस कहानी को याद करना होगा… जब रणभूमि पर विश्व के दो सबसे अच्छे धनुर्धर यानि की अर्जुन और कर्ण एक दूसरे के सामने थे…  

ये कहानी महाभारत के युद्ध के दौरान की है… जब कर्ण और अर्जुन एक दूसरे के सामने खड़े थे… तब युद्ध के दौरान कर्ण के रथ का पहिया नीचे जमीन में धस गया था… कर्ण रथ का पहिया बाहर निकालने की कोशिश करने थे…

तभी भगवान श्री कृष्ण के कहने पर अर्जुन ने कर्ण पर बाण चला दिया… बाण लगने के बाद कर्ण ने कहा कि है भगवन ये अधर्म हो रहा है… अर्जुन कायरों की तरह निहत्थे पर बाण चला रहा है…

फिर कर्ण अर्जुन की तरफ मुड़े और उन्होंने अर्जुन से कहा कि कायर मत बनो, एक निहत्थे योद्धा पर बाण चलाकर तुम कायर ही कहलाओगे और साथ ही ये धर्म के भी विरुद्ध है…

कर्ण की ये बातें सुनकर भगवान श्री कृष्ण ने कहा कि जब अधर्मी व्यक्ति किसी समस्या में फंसता है तभी उसे अपने धर्म और मर्यादा की याद आती है… जब भरी सभा में द्रौपदी का चीरहरण हो रहा था तब कहा था धर्म…?

जब द्युत क्रीड़ा में कपट हो रहा था तब कहा था धर्म… जब पांडवों से उनका अधिकार छीना जा रहा था तब कहा था धर्म… जब अकेले अभिमन्यू की चक्रव्यूह में हत्या की गई तब कहा था धर्म….

ये सभी अधर्म की ही घटनाएं थीं…कर्ण तब कहां था तुम्हारा धर्म, तुम्हें धर्म की बात कहने का कोई अधिकार नहीं है… और जो तुम्हारे साथ हो रहा है वो तुम्हारें ही कर्मों का फल है…

दूसरी तरफ जब तीरों से कर्ण को घायल करने के बाद अर्जुन को ये ज्ञात हुआ कि कर्ण जिसे वो घायल कर चुके हैं… वो तो उनके जेष्ठ हैं… ऐसे में शक भरी नजरों से उन्होंने भगावन श्री कृष्ण की ओर देखा और कहा कि है माधव आपने मेरे हाथों ये कैसा अधर्म करा दिया…

अर्जुन ने आगे कहा कि माधव मेरे हाथ कांप रहे थे… तब आपने कहा था कि मैं एक सदात्मा को उसके भार से मुक्त कर रहे हो… लेकिन ये क्या आपने तो मेरे मस्तक पर अपने ही जेष्ठ की हत्या का कलंक लगा दिया?

तब श्री कृष्ण ने कहा कि मनुष्य को प्रारबध देने वाला मैं कौन होता हूं… मनुष्य को प्रारबध उसके कर्म देते हैं… बीज में स्वस्थ मीठे फल लगेंगे… या उस बीज को सूख जाना होगा… इसका चयन तो बीज स्वयं करता है पार्थ… अपनी धरा चुनकर

श्री कृष्ण ने आगे कहा कि पार्थ तुमने धर्म का साथ देना चुना… और कर्ण ने अधर्म का साथ देना… ऐसे में मैं क्या करता… तुमने अन्याय के विरोध स्वर उठाया.. और अंगराज सब जानते हुए भी मौन रहे…

मैंने कई बार विकल्प चुनने के अवसर कर्ण को दिए… लेकिन उन्होंने हर बार दुर्योधन और उसकी मित्रता का चयन किया… ऐसे में बताउं मैं क्या करता…?  

इस महायुद्ध में कई अहूतियां डलनी थी… अधर्म के खिलाफ लड़े जा रहे इस युद्ध में एक अहूती अंगराज कर्ण की भी डलनी जरूरी थी… मैंने तो केवल तुम्हारे जेष्ठ को उनकी पीड़ा… उनके भार से मुक्त किया है…

भगवान श्री कृष्ण की ये बात सुनकर कर्ण ने भी अर्जुन से कहा कि मैं पहले इस संसार से बहुत क्रोधित था… क्योंकि इस संसार ने हमेशा परिवर्तन की कामना करने वाले को गलत ही समझा है… लेकिन अब ऐसा नहीं है… आज मैं खुद को भारमुक्त महसूस कर रहा हूं…

मुझे इस बात का ज्ञात हो चुका है कि मेरी मौत से अधर्म का विनाश होगा… और मेरे मरने के बाद भी इस संसार में परिवर्तन आएगा… और यही तो मेरे जीवन का एक मात्र लक्ष्य था… इसलिए तुम पश्चताप मत करो अर्जुन….

यही नहीं भगवद गीता में ये भी स्पष्ट रूप से भगवान कृष्ण ने कहा है कि लक्ष्य महत्वपूर्ण है ना कि वहां पहुंचने का रास्ता… महाभारत में भगवान कृष्ण का पहला लक्ष्य धर्म की रक्षा करना और अधर्म का नाश करना था…

धर्म की रक्षा के लिए कृष्ण नियमों को तोड़ने से भी पीछे नहीं हटे… और कर्ण का वध इसका सबसे बड़ा उदाहरण है…

हालांकि श्री कृष्ण के कर्ण को मारने का सही जवाब दे पाना मुश्किल है…. लेकिन जो अधर्म के रास्ते पर चलेगा उसका सर्वनाश निश्चित है…

मित्रों कर्ण ग़लत नहीं थे, सिर्फ उन्होंने गलत लोगों का साथ दिया था… और यही वजह है कि उनकी मौत के बाद भी दुनिया भर में उनको आज भी इज्जत से याद किया जाता है…

तो आज की वीडियो में बस इतना ही… अगर ये वीडियो पसंद आई हो तो इसे लाइक और शेयर जरूर करना… और हां नीचे कमेंट कर जरूर बताएं कि कर्ण के वध पर आपकी क्या राय है…

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