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दुष्ट स्त्री कैसे तबाह कर देती है पुरुष के जीवन को, एक सच्ची घटना

by Divine Tales

बहुत समय पहले की बात है तुंगभद्रा नदी के किनारे बसे एक नगर में एक ब्राह्मण रहा करता था.. जिसका नाम आत्मदेव था… आत्मदेव का विवाह धुंधली नाम की एक कन्या से हुआ था… धुंधली रुप की जितनी खूबसूरत थी… गुणों की उतनी ही खराब थी.. दुष्टता और ईर्ष्या तो उसकी असली पहचान थी… पर ऐसी पत्नी मिलने के बावजूद भी आत्मदेव अपना जीवन बहुत शांति से बीता रहा था… और साथ ही अपनी पत्नी की जरुरतों का ध्यान रख रहा था।

आत्मदेव की शादी को कई साल बीत चुके थे… पर इतना समय होने के बाद भी उसे किसी संतान की प्राप्ति नही हो रही थी… उसने कई दान पुण्य, हवन यज्ञ किये पर फिर भी उसे संतान का सुख नही मिला…  इस बात से दुखी होकर एक दिन आत्मदेव आत्महत्या करने निकल गया।

वो जा ही रहा था कि रास्ते में उसे एक तालाब नजर आया… दुखी होकर आत्मदेव उसी तालाब के किनारे बैठ गया… तभी वहां से एक बेहद तपस्वी ऋषि गुजरे.. उन्होंने जब आत्मदेव को देखा तो उसकी चिंता का कराण पूछने लगे… संयासी के सवाल पूछते ही उसने अपने दुख की वजह तुरंत उन्हें बता दी… ऋषि ने कहा तुम्हारे मस्तक कि रेखाएं ये साफ बता रही है कि तुम्हारे पिछले जन्म के कर्मों के कारण ही तुम्हें इस जन्म में संतान का सुख नही मिल पा रहा.. इसलिए इस सत्य को स्वीकार लो.. और अपना मन भगवान की भक्ति में लगाओ।

आत्मदेव ने कहा बिना संतान मेरी जीने की कोई  इच्छा नही है… मेरा मर जाना ही बेहतर होगा…. आत्मदेव की दुख भरी बातें सुनकर तपस्वी को उस पर दया आ गयी… उन्होंने एक सेब उसे दिया और कहा कि इसे अपनी पत्नी को खिला देना।

आत्मदेव तुरंत अपने घर गया और सारी बात धुंधली को बताते हुए उस वो सेब खाने को दे दिया…. पर धुंधली बच्चे की जिम्मेदारियों से बचना चाहती थी… इसलिए वो नही चाहती थी कि वो गर्भ धारण करें… उसने उस सेब को छिपा दिया और अपने पति से झूठ बोल दिया।

कुछ दिन बाद धुंधली की बहन मृदुली उसके घर आयी तो उसने अपनी बहन को सारी बतायी… उस समय मृदुली ने गर्भ धारण कर रखा था… इसलिए अपनी बहन की मदद करने के लिए उसने एक योजना बनाई… उसने धुंधली से कहा कि जब तक मेरे बच्चा नही हो जाता तब तक तुम गर्भवती होने का नाटक करती रहो… कुछ महीना बाद जब मेरा बच्चा होगा तो वो मैं तुम्हें दें दूगी और कह दूंगी की मेरी बच्चा जन्म लेते ही मर गया।

धुंधली ने अपने पति का दिया सेब बाहर बंधी गाय को खिला दिया… और सब कुछ योजना के अनुसार करने लगी… धुंधली ज्यादातर पर्दें में ही रहती थी.. इसलिए ये नाटक करना उसके लिए मुश्किल नही था।

नौ महीने बाद जब मृदुली के पुत्र हुआ तो उसने अपना पुत्र धुंधली को सौंप दिया और वहां से चली गयी… धुंधली ने उस बालक का नाम धुंधकारी रखा… उधर तपस्वी का दिया सेब खाने की वजह से गाय भी गर्भवती हो गयी थी… इसलिए समय आने पर उसने भी एक नवजात शिशु को जन्म दिया.. गाय ने जिस बच्चे को जन्म दिया उसका शरीर तो इंसानों जैसा था पर उसके कान गाय की तरह थे.. इसलिए उसका नाम गौकर्ण रखा गया।

समय के साथ दोनों बालक बड़े हुए… जहां एक ओर गोकर्ण समझदार और विद्वान व्यक्ति था… तो वही दूसरी ओर धुंधकारी बहुत ही बत्तमीज और दुष्ट प्रकृति का इंसान था.. दोनों के गुणों में जमीन आसमान का अंतर था… आत्मदेव धुंधकारी की आदतों से तंग आ चुका था.. क्यों कि वो हर समय जूआ शराब से ही घिरा रहता था… और बाकी बचे समय में वो वैश्याओं के पास चला जाता था… ये सब आत्मदेव की बर्दाशत के बाहर हो चुका था… इसलिए उसने गोकर्ण से इस समस्या का समाधान पूछा… गोकर्ण ने अपने पिता से कहा कि आप अब संयास ले लीजिए।

आत्मदेव को भी ये बात ठीक लगी और वो घर छोड़कर हमेशा के लिए चला गया… उधर धुंधकारी और भी ज्यादा उदंड हो गया.. उसने धन संपत्ति के लिए अपनी मां धुंधली को मारना पीटना शुरु कर दिया… हद तो तब हो गयी जब वो रोज 5 वैश्याओं को लेकर अपने घर आने लगा.. ये सब धुंधली से सहा नही गया और उसने कुंए में कूद कर अपनी जान दें दी।

इसके बाद धुंधकारी की आय्याशियाँ और बढ़ गयी.. वो वैश्याओं पर और भी पैसे उड़ाने लगा.. इतना ही नही जब उसके पास धन खत्म हो गया.. तो उन्हें खुश करने के लिए उसने चोरी करना शुरु कर दिया।

एक दिन वैश्याओं ने सोचा ये अब चोरी का धन लाने लगा है… अगर किसी दिन इसकी चोरी पक़ड़ी गयी तो राजा साहब इसके साथ- साथ हम लोगो को भी फांसी पर चढ़ा देंगे।

पांचों वैश्याओं ने मिलकर योजना बनायी कि वो आज राज धुंधकारी को मारकर उसका सारा धन लेकर भाग जायेंगी… और उन्होनें ऐसा ही किया.. उस रात धुंधकारी जब सोना लूटकर घर आया तो उन्होंने उसे फांसी से लटका कर मारने की कोश्शि की… लेकिन जब उनकी ये कोश्शि नाकामयाब हो गयी.. तो उन्होनें जलते हुए अंगारे उसके मुंह में डाल दिया.. जिसके चलते धुंधकारी की मृत्यु हो गयी… इसके बाद उन पांचों वैश्याओं ने मिलकर एक गड्ढ़ा खोदा और उसे वही गाड़ दिया.. फिर वो सारा धन लेकर वहां से भाग गयी।

धुंधकारी जब मर रहा था.. तो वो यही सोच रहा था कि समझदार व्यक्ति वही है.. जो दुष्ट और चालाक स्त्रियों से दूर रहें.. क्यों कि ऐसी स्त्रियों के लिए कुछ भी कर लो वो एक दिन आपकी पीठ में छूरा जरुर भोखेंगी।

तो दोस्तों अब तो आप भी समझ गये होंगे कि कैसी स्त्रियों से दूर रहना चाहिए… और हां इस कहानी से ये बात भी साफ हो गयी कि आपको आपके कर्मों का फल जरुर भुगतना पड़ता है।

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