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यहां है श्रीराम की वो प्रतिमा जो बाबर के समय अयोध्या में थी

by Divine Tales

दोस्तों ये आज से चार सौ पैंतालीस साल पुरानी एक सच्ची घटना है… उस समय बाबर का शासन काल बस खतम हुआ ही था… और बाबर के राम मंदिर तोड़ने से पहले ही.. मंदिर के महंत ने श्रीराम, जानकी, लक्ष्मण और हनुमान जी की मूर्तियों को एक सुरक्षित स्थान पर छुपा कर रख दिया था.. लेकिन फिर भगवान राम ने एक ऐसी लीला रची.. कि उनके एक भक्त को वहां आकर उन्हें अपने साथ ले जाना पड़ा… और उनका वो भक्त उन्हें जहां ले गया.. वो वहां के श्रीराम राजा सरकार कहलाये..

दरअसल, महाराज मधुकर शाह कृष्ण जी के बहुत बड़े भक्त थे… और उस समय वो ओरछा में राज करते थे.. एक तरफ महाराज श्रीकृष्ण के परम भक्त थे.. तो वहीं उनकी पत्नी गणेश कुबरी प्रभु श्रीराम की बहुत बड़ी भक्त थी.. और दिन रात बस उनका ही नाम लिया करती थी.. एक बार महाराज के मन में आया कि क्यों न वृंदावन वन चलकर श्रीकृष्ण के दर्शन कर लिये जाये… वो महारानी के पास गये और उनसे बोले.. सुनो भाग्यवान, मैं सोच रहा था.. क्यों न हम लोग वृंदावन जाकर श्रीकृष्ण का आशीर्वाद लेकर आये.. लेकिन महारानी के मन में तो कुछ और ही चल रहा था.. उन्होंने कहा.. महाराज मैं आपके साथ वृंदावन नहीं जा सकती हूं.. महाराज ने हैरानी के साथ पूछा.. आखिर क्यों नहीं चल सकती है आप हमारे साथ वहां.. महारानी बोली.. महाराज मैं श्रीराम के दर्शन करने अयोध्या जाना चाहती हूं.. और मैनें वहां जाने की तैयारी भी कर ली है।

महाराज मधुकर गुस्से से आग बबूला हो गये.. और बोले…  अगर इतनी ही बड़ी श्रीराम की भक्त हो तुम कि उनके लिए मेरे साथ चलने को मना कर दिया.. तो तुम अपने भगवान को यहीं क्यों नही ले आती हो.. महाराज की गुस्से स कही ये बात महारानी के मन में घर कर गयी.. और उठते- बैठते उनके मन में ये बात गूंजने लगी.. तब महारानी गणेश कुबरी ने ये तय किया.. कि वो अपने भगवान श्रीराम को ओरछा लाकर रहेंगी।

इसके बाद महारानी आय़ोध्या के निकल गयी.. वहीं पहुंचकर महारानी ने लक्ष्मण किले के पास एक कुटिया बनाई.. और साधना करन लगी.. कहा जाता है कि उस समय संत तुलसीदास जी भी वहीं थे.. और रामचरित मानस लिख रहे थे.. इतनी ही नहीं महारानी को उनका आशीर्वाद भी मिला था… लेकिन बहुत समय बीत जाने के बाद भी जब महारानी को श्रीराम के दर्शन नहीं मिले.. तो उनका मन बहुत दुखी हो गया.. और उन्होंने अपना शरीर त्यागने का निश्चय कर लिया.. ऐसा करने के लिये उन्होनें सरयू नदी में डुबकी लगा दी.. सरयू के तेज मझदार के बीच.. प्रभु श्रीराम ने उन्हें दर्शन दिये.. प्रभु को देखते ही महारानी गणेश कुबरी की खुशी का ठिकाना नही रहा.. उन्होंने प्रभु से कहा.. प्रभु मैं आपको अपने साथ ले ओरछा ले जाना चाहती हूं.. कृपया मेरी इस विनती को स्वीकरा करें।

भगवान राम ने कहा.. मैं तुम्हारे साथ ओरछा चलने को तैयार हूं.. लेकिन मेरी तीन शर्तें हैं… पहली..ये यात्रा पैदल होगी.. और इस यात्रा में मैं अकेले नहीं. बल्कि मेरे साथ साधु संत भी होंगे.. जो नाचते- गाते हुए मेरे साथ चलेंगे.. दूसरी शर्त ये है कि ये यात्रा पुष्यनक्षत्र से पुष्य नक्षय के बीच ही होगी.. और तीसरी शर्त ये कि एक बार भी मुझे जहां विराजित कर दिया जायेगा.. फिर मैं वहां से नहीं उठूंगा।

महारानी इस बात से इतनी खुशी थी कि उनके प्रभु ओरछा आ रहे है.. उन्होंने वो सारी शर्तें तुंरत मान ली… और नदी से बाहर निकलते ही उन्होंने तुंरत महाराज को ये संदेख भिजवाया.. कि मैं श्रीराम को लेकर ओरछा आ रही हूं.. उधर जैसे ही ये बात महाराज को पता चली.. उन्होनें भव्य चतुर्भुज मंदिर बनवाना शुरु कर दिया..

इसके बाद अयोध्या मंदिर के पुजारी ने बाबर के आक्रमण के पहले छुपायी गयी श्री राम, लक्ष्मण, सीता और हनुमान की प्रतिमायें महारानी को सौंप दी.. महारानी अपनी शर्ते निभाते हुए साधु- संतों के साथ विक्रम समवत सोलह सौ तीस श्रावण शुक्ल पंचमी को अयोध्या से ओरछा के लिए निकल गयी… और ठीक आठ महीने अट्ठाइस दिनों के बाद, चैत्र शुक्ल नवमी पुष्य नक्षत्र विक्रम समवत सोलह सौ इक्कतीस.. यानि की सोमवार, सन् पंद्रह सौ चौहत्तर में ओरछा पहुंच गयी।

महारानी का बुहत मन था कि वो अपने प्रभु राम का राज्यअभिषेक करके.. किसी अच्छे मूहर्त में उनको मंदिर में स्थापित करें.. इसलिए श्रीराम को अच्छे से तैयार कर के उन्होंने महल में विराजित कर दिया.. लेकिन जब मंदिर में स्थापना के लिए उन्हें वहां से उठाने का प्रय़ास किया गया तो कोई उस मूर्ति को हिला तक नहीं पाया… तब महारनी को तीसरी शर्त याद आयी.. कहा जाता है कि तब श्रीराम अपने बाल रुप में ओरछा आये थे.. अब कोई बच्चा अपनी मां को छोड़कर भला कैसे जा सकता है.. ऐसे में महारानी ने महल को ही मंदिर का रुप देने का आदेश दे दिया.. और विवाह पंचमी के दिन विधिवत उनका विवाह कर के उन्हें वहा स्थापित कर दिया.. फिर धूमधाम से उनका राजतिलक किया.. महारानी ने श्रीराम के राज तिलक में उन्हें ओरछा नगरी भेंट कर दी। 

माना जाता है कि जिस दिन ओरछा में उनका राज्य अभिषेक हुआ.. उसी दिन रामचरित मानस भी पूरी हुई थी.. तब से उत्तर भारत के धार्मिक क्षेत्रों के साथ- साथ.. संत समाज में राजा मधुकर शाह और रानी गणेश कुबरी को दशरथ और कौशल्या के रुप में मानने लगे है.. और इस तरह प्रभु राम श्रीराम राजा सरकार कहलाये।

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